यह अनुभाग ऐसे कानूनों का समेकन प्रस्तुत करता है जो भारत में महिलाओं के विरुद्ध होने वाले यौन-आधारित उत्पीड़न को रोकने और बनाने के नियमों को स्पष्ट करते हैं, खासकर कार्यस्थल पर. इसमें स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार की शारीरिक, मौखिक या संकेतों के माध्यम से उत्पीड़न माना जाएगा और इन गतिविधियों के द्वारा महिला कर्मी की स्वायत्तता और सम्मान पर क्या प्रभाव पड़ सकता है. लैंगिक उत्पीड़न की परिभाषा केवल कमेंट या आचरण तक सीमित नहीं है, बल्कि शारीरिक स्पर्श, अवांछित प्रस्ताव या सहमति के बिना संपर्क बनाने जैसी परिस्थितियों को भी सम्मिलित करती है, साथ ही ऐसी भाषा, प्रतिक्रियाएँ या दृश्य सामग्री जो महिला के अस्तित्व के खिलाफ हों, भी शामिल मानी जाती है।
समस्या की तात्कालिकता के बावजूद कानून यह मानता है कि किसी भी प्रकार की हरकत जो महिला की सहमति के बिना शारीरिक संपर्क या आपत्तिजनक सामग्री के वितरण से जुड़ी हो, उसे उत्पीड़न की श्रेणी में रखा जाएगा। यह परिभाषा उन गतिविधियों को भी कवर करती है जिनमें कामंसाइट, मोहित करने या यौन संबंध बनाने के दबाव के तौर पर व्यवहार किया जाता है—ज़्यादा साफ़ शब्दों में कहा जाए तो यौन-अभिरुचि या हिंसक प्रतिक्रिया, अश्लील टिप्पणियाँ, अश्लील चित्र या फिल्मों के साझा करने जैसी चीजें भी उत्पीड़न के दायरे में आती हैं।
इस कानून के महत्वाकांक्षी भागों में यहestones शामिल हैं कि workplaces में शिकायत दर्ज करने और समाधान निकालने के लिए एक आंतरिक समिति (Internal Committee) स्थापित होनी चाहिए, ताकि कार्यस्थल के भीतर विश्वास और सुरक्षा का माहौल बना रहे. यह समिति शिकायतों की सुनवाई, तथ्य जुटाने और त्वरित निर्णय के लिए जिम्मेदार होती है, ताकि महिला कर्मचारियों को तात्कालिक राहत मिल सके और बिना देर के न्याय मिल सके. साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि शिकायतकर्ता को कानून के दायरे में संरक्षण और उपचार मिलना चाहिए, और यदि आवश्यक हो तो उत्पीड़न के मामलों के लिए आगे की कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
समय-सीमा और प्रक्रिया भी महत्त्वपूर्ण बिंदु हैं: शिकायतों की प्रारंभिक जाँच और निर्णय की समयसीमा निर्धारित है ताकि दायरे के भीतर त्वरित उपयोग हो सके. यदि संस्थान विवाद को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने के लिए मध्यस्थता चाहتا है, तो यह संभव है, लेकिन मध्यस्थता के दौरान भी महिला की सुरक्षा और सम्मान की पूर्ति का ध्यान रखना अनिवार्य है. मामला अगर आंतरिक प्रक्रिया से नहीं सुलझ पाता, तो उसे अन्य कानूनी मंच तक ले जाने की व्यवस्था भी शामिल है।
कानून यह भी बताता है कि उत्पीड़न के बावजूद शिकायतकर्ता को सुरक्षा, प्रमाण-रक्षा और उचित सहायता सुनिश्चित हो, ताकि वे अपनी नौकरी और मौके को बनाए रख सकें. अगर अधिकारी या संस्थान द्वारा उचित कार्रवाई नहीं हो पाती, या उत्पीड़न जारी रहता है, तो महिला के हित में अन्य उपलब्ध कानूनी उपायों की दिशा में आगे बढ़ना संभव है. इसके अतिरिक्त, कानून यह भी स्पष्ट करता है कि यह उत्पीड़न केवल एक व्यक्ति के कार्य से नहीं, बल्कि संस्था के भीतर संरचनात्मक और व्यवहारिक शर्मिंदगी का परिणाम भी हो सकता है, जिसे रोकना और सुधारना अनिवार्य है।
यह भाग बच्चों के विरुद्ध होने वाले यौन अपराधों से सुरक्षा के लिए बनाए गए प्रमुख कानूनों की समझ देता है, खासकर 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों की सुरक्षा पर केंद्रित. POSCO अधिनियम बाल-रक्षा की एक संरचना बनाकर बच्चों के खिलाफ होने वाले विभिन्न प्रकार के अपराध रोकने और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने पर केंद्रित है। इसमें बच्चों की सुरक्षा की दृष्टि से विशेष प्रावधान रखे गए हैं ताकि अपराधी को कठोर दंड मिले और पीड़ित बच्चे को आवश्यक संरक्षण मिले।
सबसे स्पष्ट प्रावधानों में यह है कि बच्चों के साथ होने वाले अपराधों से जुड़ी प्रक्रिया, गाइडलाइनों और साक्ष्य-संग्रह के तरीके बच्चों के हित और सुरक्षा के अनुरूप हो. 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे के विरुद्ध अपराधों को त्वरित ढंग से निपटाने के लिए विशेष न्यायिक व्यवस्था की व्यवस्था है, ताकि साबित करने की जिम्मेदारी और अदालतों की प्रक्रियागत गति उच्च स्तर पर बनी रहे. इस कानून के अंतर्गत बच्चों की पहचान, सुरक्षा और गोपनीयता को भी एक गंभीर अधिकार माना गया है, ताकि अपराधियों की सुरक्षा-निगरानी के दायरे में बच्चों की व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग न हो।
POSCO अधिनियम के अंतर्गत बच्चों के संरक्षण के लिए विशेष तंत्र और उपकरण तैयार किए गए हैं ताकि बच्चों के साक्ष्यों, गवाहियों और उन्हें मिलने वाली सहायता की जाँच-साक्ष्य प्रक्रिया children's-friendly हो. इसमें यह भी व्यवस्था है कि बाल-गोपनीयता और सुरक्षा के प्रावधान लागू रहें ताकि अपराध के मामलों में बच्चों के अनुभव और भलाई पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े. साथ ही यह कानून बताता है कि बच्चों के साथ शोषण या अपराध के मामलों में पुलिस और न्यायिक निर्णय प्रक्रिया में सुरक्षा, सम्मान और मानवीय दृष्टिकोण से काम किया जाए।
अतिरिक्त बिंदुओं में यह शामिल है कि बच्चों के मामले में दिये जाने वाले उपचार, देखभाल और संरक्षण के उपाय—जैसे चिकित्सा, परामर्श, और परिवार के साथ सुरक्षित वातावरण की उपलब्धता—का भी ध्यान रखा जाए. अपराधों का विवरण और परिभाषाओं में स्पष्टता है ताकि विभिन्न प्रकार की यौन-हिंसा, शोषण और उत्पीड़न के मामलों में कानून समान रूप से लागू हो सके. अंततः, यह कानून बच्चों के संरक्षण की दिशा में सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं के प्रभाव को समझते हुए सुरक्षा-समर्थन सेवाओं को बढ़ाने का दावा करता है ताकि बच्चे बिना भय के अपने जीवन के महत्वपूर्ण चरणों तक पहुँच सकें।
इस खंड में घरेलू हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों की संकल्पना स्पष्ट की जाती है. घरेलू हिंसा में शारीरिक हिंसा, मानसिक उत्पीड़न, अन्य प्रकार के हमले या रोक-टोक जैसी कार्रवाई, आर्थिक नियंत्रण और भावनात्मक दमन शामिल हो सकते हैं, जो महिला, वह रिश्ते में होती है या उसके परिवार के सदस्य होते हैं, इन सबको कानून के दायरे में लाने के प्रयास हैं. इसका उद्देश्य यह है कि पीड़िता को सुरक्षित वातावरण, सुरक्षा आदेशों, और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जाए ताकि वह खतरे में रहते हुए भी अपने जीवन की स्वायत्तता बनाए रख सके।
लागू प्रावधान बताते हैं कि घरेलू हिंसा करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी और महिला को सुरक्षा प्राप्त करने के लिए आपातकालीन सुरक्षा आदेश, स्थाई सुरक्षा आदेश या अन्य समुचित राहतों के लिए अदालत में आवेदन करने का अधिकार है. कानून के अनुसार महिला को शारीरिक, मौलिक, भावनात्मक और आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाले व्यवहार को रोकने के लिए कानूनी संरक्षण उपलब्ध कराए जाते हैं, साथ ही उसे और उसके बच्चों की सुरक्षा हेतु आश्रय-गृह, चिकित्सा सहायता और परामर्श जैसी सुविधाओं तक पहुँच दी जाती है.
घरेलू हिंसा के कानूनी ढांचे के भीतर, पीड़िता को हानि पहुँचाने वाले व्यवहार को रोकना, महिला के साथ असंतुलित शक्ति-समतुलन को सही करना और उनके समुदाय-परिवार में सुरक्षित पुनर्वास सुनिश्चित करना प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है. साथ ही, कानून यह भी बताता है कि पुलिस और न्यायिक प्रक्रियाओं के बीच समन्वय बनाकर शिकायतों की त्वरित सुनवाई और सुरक्षा-उपाय लागू करना अनिवार्य है. यह व्यवस्था पीड़िता और उसके परिवार के लिए एक संरक्षित स्थान बनाती है, ताकि वे अपने जीवन की सामान्य गतिविधियाँ फिर से शुरू कर सकें और किसी भी प्रकार के दमन से मुक्ति प्राप्त कर सकें.
ऊपर दिए गए कानून अलग-अलग दायरे में रहते हुए भी एक दूसरे से जुड़ते हैं ताकि महिलाओं और बच्चों को व्यापक सुरक्षा मिले. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ त्वरित और प्रभावी उपाय करने वाले आंतरिक तंत्र, POSCO जैसे बच्चों की सुरक्षा के लिए कानून, और घरेलू हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा के मजबूत प्रावधान—ये तीनों मिलकर समाज के भीतर महिलाओं की सुरक्षा का एकीकृत ढांचा बनाते हैं. इन कानूनों का सही अनुप्रयोग यह सुनिश्चित करता है कि पुरुष और महिला के बीच असमान शक्ति-स्थिति के बावजूद महिला सुरक्षा के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन हो, शिकायतों के लिए संरक्षित स्थान उपलब्ध हों, और पीड़िता को न्याय के अवसर मिलते रहे।
सार के रुप में, यह दस्तावेज़ तीन प्रमुख मोर्चों पर केंद्रित है: (1) कार्यस्थल पर उत्पीड़न की रोकथाम और त्वरित निवारण व्यवस्था, (2) बाल-केन्द्रित सुरक्षा ताकि बच्चों के विरुद्ध अपराधों के अपराधी को कठोर दंड और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित हो, और (3) घरेलू वातावरण में हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा और सहायता के प्रावधान. इन सभी के माध्यम से महिलाओं, बच्चों, और परिवारों की शांति, सम्मान और सुरक्षा की सुरक्षा-रेखा मजबूत बनती है ताकि सामाजिक-आर्थिक विकास में महिलाएं पूर्ण सहभागिता कर सकें।
निष्कर्षतः, यह संकलन दर्शाता है कि कानून के साथ समाज के संस्थागत ढांचे में किस प्रकार सुधार और संवेदनशीलता लाकर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा हो सकती है. यह सिर्फ कानूनों का एक जाल नहीं है, बल्कि वे सुरक्षा के अभ्यास हैं जिन्हें साझा जवाबदेही, जागरूकता और उचित संस्थागत क्रियाओं के माध्यम से सुदृढ़ किया जाना चाहिए. कानून का सच यह है कि सुरक्षा केवल व्यक्तिगत अधिकार नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से मान्य सुरक्षा-चाहत है जिसे कानून और समाज सहयोग से ही संभव बनाया जा सकता है. इन प्रावधानों का वास्तविक प्रभाव यह होगा कि महिलाएं और बच्चे भयमुक्त जीवन की ओर बढ़ने में समर्थ हों, उनके समान अवसर सुनिश्चित हों, और वे अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले सकें।